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कर्नाटका के किसानों ने कुछ इस तरह किया अपने जल संकट का निवारण

उत्तरी कर्नाटक में हुबली के पास कमप्लीकोप्पा गॉंव के ६० वर्षीय किसान देवेन्द्रप्पा बासन्थप्पा बासती ने १९९८ में अपना पहला बोर-बेल खोदा। उसने सोचा एक बार बोरवेल चालू होने के बाद में उसके ३० एकड़ के खेत की सिंचाई सम्भव होगी।

दुर्भाग्य से उसका पहला प्रयास सफल नहीं हो सका, उसे पानी नहीं मिल पाया। दूसरे प्रयास में भी उन्हें असफलता ही मिली। २१ प्रयासों के बाद ५०० फ़िट की गहराई पर देवेन्द्रप्पा को २ बोर-बेल में पानी मिला। जिन्होंने १० वर्षों तक कार्य किया, लेकिन जैसे जैसे पानी निकलता बोर-बेल का पानी कम होते होते सूख गया।

फ़सल के लिए पानी न मिल पाने की सोच से वह बहुत दुखी था। चार बेटियों और एक बेटे के बड़े परिवार के पालन के लिए उसके पास सिवाय दूसरा बोर-बेल खोदने के दूसरा विकल्प न था, ऐसे में वह हुबली के एक व्यवसायी सिकन्दर मीरानायक से मिला। मीरानायक किसानों के जल संकट की समस्या को मृत बोर-बेल को पुन: चालू कर सुलझा रहे थे।

मीरानायक अपने Sankalpa Rural Development Society (SRDS) नामक संगठन के माध्यम से किसानों को फ़सल के लिए प्रचुर मात्रा में पानी उपलब्ध कराने में सहायता कर रहे हैं।

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देवेन्द्रप्पा के अलावा अनेकों किसान सिंचाई के लिए बोर-बेल पर ही निर्भर हैं। उत्तरी कर्नाटक की अर्थ व्यवस्था जो मुख्यत: कृषि पर निर्भर है लगातार बोरबेल का पानी सूखने से प्रभावित होती है।

हुबली के ही एक अन्य किसान चितरंजन ने १९८८ एक बोरबेल खुदवाया था। पिछले २० वर्षों से कार्य न करने के कारण उसने उसे ऐसे ही छोड़ दिया। २०१० में उसने मीरानायक से मिलकर बोरबेल पुर्न जीवित करना सीखा।

बोरबेल रिचार्ज संरचना निर्माण के बाद चितरंजन ने वर्षा की प्रतीक्षा की। एक दिन की बारिश से ही बोरबेल में पानी की प्रचुर मात्रा दिखने लगी। चितरंजन कहते हैं “बोरबेल में मैंने इतना पानी कभी नहीं देखा था। यह आश्चर्यजनक था।”

जो बोरबेल कई वर्षों से सूखा पड़ा था, हमेशा पानी से भरा रहता है। इसने चितरंजन की कृषि सम्बन्धी समस्या हल कर दी। चितरंजन कहते हैं “प्रारम्भ में मैं उलझन में था मेरे पूर्व के सारे बोरबेल बेकार हो गये थे। मैं सोच भी नहीं सकता था कि इतना अच्छा परिणाम मिलेगा।”

उसने अब अपने फ़ार्म में आम के पेड़ लगाये हैं। पहले जहाँ वह मुश्किल से एक दिन में एक एकड़ सिंचाई कर पाता था, अब दो एकड़ आराम से सींच लेता है। पानी जो पहले कम रहता था अब अच्छी स्थिति में है। पानी ३ इंच के पाइप द्वारा ६ से ८ घंटे लगातार पूरे जोर से आता रहता है।

बोरबेल की पानी क्षमता ७ से ८ एकड़ तक सिंचाई की हो गयी है। चितरंजन ने अपनी ३.५ एकड़ अनउपजाऊ ज़मीन में केले की खेती शुरु कर दी है।

चितरंजन और देवेन्द्रप्पा की तरह सैकड़ों किसान कम लागत वाली रिचार्ज तकनीक का लाभ उठा रहे हैं।

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उत्तरी कर्नाटक भारत के सबसे सूखे क्षेत्रों में से एक है, इसपर भी कृषि प्रधान हैं। कम बारिश के कारण जल स्तर कम होने से कई बोरबेल सूख जाते हैं। नये बोरबेल

नये बोरबेल की अत्यधिक गहरी खुदाई और निरंतर प्रयोग ने यहाँ की स्थिति को और ख़राब कर दिया है। मीरा नायक के NGO, SRDS ने इन किसानों को बड़ी राहत दी है।

कर्नाटक के गाडग जिले के कोटूमागाची गॉंव में मीरानायक ने पानी की समस्या बड़ी कम उम्र में महसूस किया। इसी कारण उनमें पानी की हर बूँद की उपयोगिता का पाठ सिखा दिया।

मीरानायक कहते हैं “मैंने किसानों की कई समस्याओं एवं सूखे से जूझते देखा है, मैंने इन्हें समझा है।” गडग में जब ३वर्ष लम्बा सूखा पड़ा। मीरानायक ने फ़ार्म तालाब एवं बोरबेल बनाने का कार्य किया। इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि किसानों के लिए नये बोरबेल बनाना कितना मंहगा है। इससे प्रेरित होकर उन्होंने किसानों की मदद के लिए सस्ते विकल्पों की ओर सोचा।

SRDS पद्धति से बोरबेल रिचार्ज की क़ीमत २००००/- पड़ती है, जो नये बोरबेल की लागत से बहुत कम है। मीरानायक ने लगभग १० दिन में इस बोरबेल रिचार्ज सिस्टम को पूरा बना देते हैं।

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सिकंदर मीरानायक 

नये बोरबेल के बनाने में १०००००/- से १५००००/- रुपये तक लागत आती है। जो तमाम किसान के लिए बहुत ज़्यादा है। इससे फ़सल की बर्बादी होती है। परिणामत: कुछ किसान खेती बाड़ी छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने को बाध्य हो गये।

समाजिक कार्य प्रबन्धन में स्नातक मीरानायक ने प्रारम्भ में पानी के श्रोतों के संरक्षण पर कार्य करने वाले कई NGOके साथ कार्य किया। उनका यही अनुभव बोरबेल रिचार्ज के लिए कार्य करते समय बहुत काम आया।

२००८ में SRDS की स्थापना के बाद मीरानायक और उनकी टीम ने हुबली,  धारबाड, गाडग, हावेरी, बँगलौर, अमरावती, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश सहित भारत के कई गाँवों में ८७० से ज़्यादा बोरबेल रिचार्ज कर दिये हैं।

मीरानायक का प्रमुख लक्ष्य किसानों की आवश्यकता एवं परिस्थिति के अनुरूप नये तरीक़े अपनाकर प्रयुक्त हो रही सिंचाई तकनीक की लागत को कम करना है।

इसकी कार्य प्रणाली

१) बोरबेल के चारों ओर १०x१० फ़ीट का ज़मीन में पानी सोखने के लिए कच्ची तली का गड्ढा बनाते हैं। साथ ही लगा हुआ एक छोटा तालाब खोदते हैं (तालाब बहुत बड़े आकार का होना ज़रूरी नहीं है)।

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२) पानी सोखने बाले गड्ढे की दीवारों पर पत्थरों से चिन देते हैं।

३) तली में ३ इंच मोटी रेत की तह बिछाते हैं।

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४) बोरबेल के बड़े पाइप में छेद या झीरी बनाकर उसे घास फूँस से बन्द कर देते हैं ताकि उसमें पानी के अलावा कुछ और न जा। पाये।

५) बोरबेल के चारों ओर सीमेंट बड़े छल्ले डालकर जोड़ देते हैं व खुला छोड़ देते हैं।

६) छल्लों के बाहर का शेष भाग रेत, बजरी पत्थर से भर देते हैं।

७) बरसात का पानी तालाब से उस गड्ढे में आता है वहॉं से रेत पत्थर से झनता हुआ सीमेंट के झल्लों के बाहर आता है।

८) तली में रेत से छनकर यह सीमेंट केझल्लों के भीतर आता है और भर जाने पर बोरबेल के भीतर घास फूँस से ढके छेद झीरी द्वारा पहुँचता है और बोरबेल को रिचार्ज कर देता है।

इसके परिणाम

मीरानायक द्वारा प्रयुक्त बोरबेल रिचार्ज तकनीक के परिणाम स्वरुप बोरबेल का जलस्तर बढ जाता है। यहाँ तक कि पूर्ण रुप से सूखे बोरबेल के सही प्रबन्धन से वर्षा के पानी का उपयोग कर वे पुर्न जीवित हो जाते हैं।

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बोरबेल के रिचार्ज से किसानों का वार्षिक लाभ काफ़ी बढ़ जाता है। देवेन्द्रप्पा अपनी ज़मीन का शत् प्रतिशत उपयोग कर रहे हैं। उनकी वार्षिक लाभ अब ८ लाख तक पहुँच जाता है। उनके ऋण ग्रस्तता वाले दिन समाप्त हो गये हैं, यह देखकर अब अन्य किसान भी नये बोरबेल लगाने की जगह रिचार्ज का तरीक़ा अपना रहे हैं।

एकबार रिचार्ज होनेपर बोरबेल का पानी कभी नहीं सूखता। सालों बाद भी ज़मीन का जलस्तर बना रहता है। रिचार्ज से जल फिर से भरने के कारण बोरबेल हमेशा चालू रहता है। किसान भी अब वर्ष में ३, ४ फ़सल तक लेने में सक्षम होकर अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं।

मीरानायक स्पष्ट करते हैं “वारिश के छने प्राकृतिक पानी के ज़मीन के पानी से मिलने के कारण पानी की अशुद्धियॉं कम हो जाती हैं। इससे बोरबेल के पानी का भारी होना, विषैले तत्व जैसे फ्लोराइड आदि कम या समाप्त हो जाते हैं।”

राजशेखर हुबली के एक अन्य किसान अपनी सफ़लता की कहानी बताते हैं। जबसे उन्होंने बोरबेल रिचार्ज पद्धति अपनायी है उन्हें निरंतर सिंचाई को पानी मिल रहा है। अत: वे गन्ने जैसी, जिसे निरंतर पानी की आवश्यकता होती है, फ़सल भी उगाते हैं। अब किसान भी पानी की स्वायत्ता होने से नई फ़सल उगाने पर भी  प्रयोग करते हैं। राजशेखर ने २०१४ में ६ एकड़ पर शहतूत की खेती की, आज वह उससे ५००००/- रूपये प्रति माह तक की आय अर्जित करता है।

चुनौतियॉं

शत प्रतिशत सफल प्रयोग होने पर भी किसान इस नयी पद्धति को अपनाने में घबराते हैं। मीरानायक का कहना है “बहुधा किसान कुछ नया अपनाने के इच्छुक नहीं रहते, उन्हें समझाना बड़ी चुनौती है।”

बहुधा किसान रिचार्ज सिस्टम मुफ़्त या कम लागत पर करवाना चाहते हैं। इस के परिणाम एक वारिश के बाद ही मिलते हैं परन्तु वे तुरन्त परिणाम चाहते हैं। अत: वे इसे नहीं अपनाते।

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मीरानायक सरकार से किसानों को इसके लिए कुछ मदद की आशा करते हैं। लघु किसानों को ध्यान में रखते हुए मीरानायक ने भी इसकी लागत कम करने हेतु कुछ उपाय किए हैं। जिससे नयी लागत अब १५०००/-रु० तक आ गयी है इस कार्य को अब दो दिन में पूरा कर लिया जाता है जिससे मज़दूरी में भी कमी आयी है।

मीरानायक Deshpande Foundation, Save Indian Farmers आदि जैसे संगठनों से मिलकर किसानों के लिए इस पद्धति को पहुँचाने के लिए कार्य कर रहे हैं।

मीरानायक को मिले कई पुरुष्कार एवं सम्मानों के कारण किसानों में उनकी पहचान व विश्वसनीयता बनी है। उनका लक्ष्य ज़्यादा से ज़्यादा किसानों के भविष्य को जल संकट से कम लागत पर मुक्ति देना है।

मीरानायक ने ग्रामीण व शहरी आबादी के लिये वारिश के पानी से खेती करनेके कई नये तरीक़े तैयार किये हैं। वे इस कार्य को देश के तमाम क्षेत्र में फैलाना चाहते हैं। आप उनसे स्वयं के लिये और सूखा ग्रस्त क्षेत्र के किसानों की सहायता के लिये उनकी website पर सम्पर्क कर सकते हैं।

अनुवाद: बालेंद्र शेखर

 




राजस्थान की ब्लॉक प्रिन्टिग: एक लुप्तप्राय शिल्प एवं शिल्पकार को जीवन्त रखने के प्रयासों की पहल

“जिस कार्य से कभी लगभग १०० लोगों को रोज़गार मिलता था, आज मात्र २ व्यक्ति उसे पूरा कर लेते हैं। यदि व्यक्ति रासायनिक रंगों व स्क्रीन प्रिन्टिग का प्रयोग न करें तो अनेक लोगों को रोज़गार मिल सकता है। आज मात्र स्क्रीन प्रिन्टिग की वजह से तमाम छीपिकार वेरोजगार हैं।” रिंकू छिपा, जयपुर के छपाई शिल्पी कहते हैं।

रिंकू जैसे अनेक शिल्पकार इस हस्त ब्लॉक प्रिंटिग के गतिशील बाज़ार के परिवर्तन की मार झेल रहे हैं।

जो कला कभी पूरे संसार द्वारा सराही जाती थी आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। कड़ी प्रतिस्पर्धा, रासायनिक रंगों का प्रयोग, डिजिटल व स्क्रीन प्रिंटिग के कारण छीपिकरों पर संकट मँडरा रहा है।

आज जो शिल्पकार इस कार्य में लगे हैं उनकी आने वाली पीढ़ियॉं इस कारोबार से हटना चाहतीं हैं।

शिल्पकारों का संघर्ष

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सॉंगानेर के एक हस्त ब्लॉक शिल्पकार राजकुमार धनोपिया कहते हैं “अब हस्त ब्लॉक छपाई का वैभव पहले जैसा नहीं रहा, हम अपने बच्चों को यह कला देना चाहते हैं परन्तु यदि यही परिस्थितियॉं रहीं तो हमें भी इससे विमुख होना होगा। रासायनिक रंगों व स्क्रीन प्रिटिंग ने इस कला पर विपरीत प्रभाव डाला है। स्क्रीन प्रिटिंग की वजह से हमारे काम की माँग कम हो रही है। अब तो सरकार भी हमसे इस कार्य से पलायन करने को कहने लगी है। हमें सरकार से कभी इस कार्य के प्रोत्साहन के लिए कोई सहायता नहीं मिलती।”

अब तमाम बड़े लोहे के स्क्रीन स्टैन्सिल कपडों पर डिज़ाइन बनाने में प्रयोग होने लगे हैं। लगभग ४० वर्षों से बढ़ती माँग ने हस्त छपाई की धीमी कार्य प्रणाली को स्क्रीन प्रिंटिग ने बदल दिया है। स्क्रीन प्रिंटिग कम समय व श्रम के ज़्यादा उत्पाद करती है साथ ही रासायनिक रंगों ने प्राकृतिक रंगों की जगह ले ली है। जो जल्द सूखते हैं। जहाँ हाथ से कपड़े को तैयार करने में कुछ हफ़्ते लगते थे वह कार्य कुछ घंटों में हो जाता है।

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बगरू के पारम्परिक ब्लॉक छपाईकार लाल चन्द डेरावाला कहते हैं “डिजीटल स्क्रीन छपाई हमारे कार्य को प्रभावित कर रही है, लोगों को रोज़गार नहीं मिल रहा है। पारम्परिक छीपिकार जो कभी प्राकृतिक रंग एवं हस्त ब्लॉक छपाई करते थे स्क्रीन छपाई की ओर जा रहे है। क्योंकि हमारा कार्य प्रमाणिक होता है इसलिए यह स्क्रीन छपाई से मँहगी पड़ती है। इसलिए अज्ञानी लोग सस्ते की वजह से स्क्रीन प्रिंटिग की ओर आकर्षित हो रहे हैं।”

लाल चन्द और उनका परिवार कई पीढ़ियों से इस क्षेत्र में कार्य कर रहा है। उन्हें भारत सरकार ने राष्ट्रीय पुरुष्कार से भी सम्मानित किया है।

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लाल चंद डेरावाला, बगरु के शिल्पकार

इन छपाईकारों के अलावा स्क्रीन प्रिन्टिग ने लकड़ी के ब्लॉक बनाने वालों को भी प्रभावित किया है। ५० वर्षों से इस कार्य में लगे मेहरबान खान का कहना है “स्क्रीन प्रिंटिग के बाद ब्लॉक बनाने की माँग कम हुई है। हम कई नये उत्कृष्ट डिज़ाइन बाज़ार की आवश्यकतानुसार लाने की कोशिश करते हैं परन्तु स्क्रीन प्रिंटिग में कम्प्यूटर डिज़ाइन के कारण बड़ी विविधता होती है। एक हाथ कम्प्यूटर से मुक़ाबला नहीं कर सकता।

स्क्रीन प्रिंटिग के अलावा रासायनिक रंगों का प्रयोग से भी हमारी स्पर्धा है। स्क्रीन प्रिंटिग को धोने में जो पानी प्रयोग होता है नदियों में जाकर उसे प्रदूषित करता है। इस पानी से सिंचित फ़सलें अनेक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देती हैं।

बगरू निवासी अमित का कहना है “प्राकृतिक रंगों से गन्दे पानी को पीकर कोई बीमार नहीं पड़ता। लेकिन रासायनिक रंगों का पानी जीवन के लिए के लिए बहुत हानिकारक होता है।”

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समय, क़ीमत कम कर लाभ बढ़ाने के लिए अब हस्त ब्लॉक छपाई कर्मी भी रासायनिक रंगों का प्रयोग करने लगे हैं। क्योंकि ये रंग जल्दी सूखते हैं और इन्हें धुलाई की ज़रूरत भी नहीं होती।

लाल चन्द कहते हैं “जो रंग हम प्रयोग करते हैं पूरी तरह प्राकृतिक होते हैं जो किसी को हानि नहीं पहुँचाते। वहीं रासायनिक रंग व्यक्ति व वातावरण दोनों के लिए हानिकारक हैं।”

जल संकट

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राजस्थान हमेशा कम पानी की समस्या से ग्रस्त रहा है। कपड़ा उद्योग में बहुत पानी की ज़रूरत होती है जो एक गहन समस्या हैक्टेयर माल से लेकर तैयार माल तक हर जगह पानी चाहिये। कृत्रिम रंग एवं अन्य रसायन पानी में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं।

CEPT (Common Effluent Treatment Plant) ने पानी की सुलभता के लिए एक साधन दिया जो शून्य पानी प्रयोग करेगा। यह ९०% पानी को पुन: प्रयोग में लाने का प्रयास कर रहा है। लेकिन यह आसान कार्य नहीं है। इसकी कुल लागत का १५% छोटी इकाइयों को वहन करना होता है।

राजकुमार कहते हैं “जब हम न तो रसायनों का उत्पाद कर रहे हैं न ही हमारे कार्य से कोई प्रदूषण हो रहा है, तो हम इन साधनों के लिये पैसा क्यों दें? यदि सरकार इसका परीक्षण करना चाहे तो बिना झिझक कर ले, हमारे लघु गृह उद्योग हैं जो हमारे परिवार के सदस्य ही चलाते हैं।”

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सरकार को जो ब्लॉक प्रिंटिग कर, रासायनिक रंग प्रयोग करते हैं, पर कर या दंड लें न कि उनसे जो प्राकृतिक रंग प्रयोग कर रहे हैं। इन करों से हमारा आत्मविश्वास टूटता है।

ब्लॉक प्रिंटिग आ रही गिरावट को देखते हुए सरकार ने इन छीपिकारों को GI ( Geographical Indication ) प्रमाण पत्र देने शुरू किए हैं। यह प्रमाण पत्र इन छपाईकारों को इनके उत्पाद की विशेषता प्रमाणित करता है। यह ये भी प्रमाणित करता है कि उत्पाद विशिष्ट क्षेत्र का ही बना है। परन्तु न तो लोग न ही छीपिकार इस प्रमाण पत्र के बारे में जागरूक हैं। इस कमी से इनका उत्थान नगण्य ही रहा है।

लाल चन्द कहते हैं “स्थिति यह है कि हमारे बच्चे भी अब इस परम्परा को बढ़ाना नहीं चाहते। यह कार्य धैर्य, कठिन परिश्रम व लगन का है। ज़्यादातर छीपिकार अशिक्षित हैं, वे न तो दूसरी नौकरी की तलाश कर सकते हैं न ही यह व्यवसाय करना चाहते हैं, जिससे उनमें धीरे धीरे बेरोज़गारी बढ़ रही है।”

आशा की किरण

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अनेक चुनौतियों के बावजूद मूल छीपिकार इस कला को आगे बढ़ाने को दृढ़ संकल्प हैं। वे इस ४०० वर्ष पुरानी कला को जीवन्त रखने को प्रयासरत हैं। उनका विश्वास है इस मूल कार्य का कोई विकल्प नहीं है।

लाल चन्द कहते हैं “जो व्यक्ति हस्तकला के पारखी हैं गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते। ऊँचा मूल्य एवं सीमित प्रिंट होने पर भी वे केवल मूल उत्पाद ही ख़रीदते हैं। न्यूनतम मूल्य रखने की कोई सीमा न होने पर भी हम इस कला की विश्वसनीयता को बनाये रखते हैं।

धीरे धीरे छपाईकार बाज़ार में नये डिज़ाइन, रंग व छपाई के साथ प्रयोगात्मक स्पर्धा बना रहे हैं। कई छपाईकारों के पास हज़ारों लकड़ी के ब्लॉकहैं और वे अनेकों नये ब्लॉक ख़रीदकर बाज़ार में स्थापित हैं।

लाल चन्द जो पहले केवल कपड़े के थान बनाते थे। उन्होंने अब साडियॉं, दुप्पटे, स्टॉल, सूट आदि भी बनाने शुरु कर दिये हैं। उन्होंने NIFT (National Institute or Fashion Technology) से भी सम्बधत्ता की है, जो उन्हें बाज़ार में नये डिज़ाइनों के बारे में सहायता देते हैं। लाल चन्द कहते हैं ” हमारे दिमाग़ में हमेशा पुराने पारम्परिक प्रिंट रहते थे, परन्तु इन बच्चों ने नये डिज़ाइनों व प्रयोगों से हमारे व्यवसाय को बढ़ाने में हमारी मदद की है।”

वर्ष १९९७ में हस्त ब्लॉक छपाईकारों और निर्यातकों ने एक UNIDO के अन्तर्गत एक “Consortium of Textile Exporters” नामक संघ का गठन किया। यह संघ आधुनिक ज़रूरतों व उपयोग के अनुसार उच्चीकरण एवं पारम्परिक तकनीकों को दिशा देता है।

अनोखी, मेहरा शॉ जैसी कम्पनियॉं बड़े पैमाने पर इनकी कार्य प्रणाली एवं प्रामणिक प्रिंटों के बाज़ार में सहयोग कर रही हैं। लाल चन्द जैसे छपाईकार मूल प्रिंटों को आज के परिवेश के अनुसार बना रहे हैं। लाल चन्द के कपड़े पूरे विश्व में बिकते हैं। उन्हें Prince of Wales Museum Mumbai द्वारा प्राकृतिक हस्त छपाई का प्रशिक्षण भी दिया गया। ‘बगरू टैक्सटाइल्स’ जैसी कम्पनी उनमें व बाज़ार में बनी रिक्ततामें पुल का कार्य कर रही है। ‘Aavaran-Echoes of Rural India’ का लक्ष्य इन छपाईकारों एवं पारम्परिक कला का उत्थान करना है। ‘आवरण’ का प्रयास डाबू, मड़, फेनटिया प्रिंट जैसी पारम्परिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए आधुनिक सोच के डिज़ाइनों व गुणवत्ता को बनाना है।

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वह कहते हैं “यह मात्र हमारे जीवनयापन का श्रोत मात्र न होकर हमारा स्वाभिमान व प्रसन्नता भी है।”

लाल चन्द इस कला को अपने तक सीमित न रखकर विश्वव्यापी बनाना चाहते हैं। वह कहते हैं “मुझे अपने व्यापार के बहुत बढ़ने या न बढ़ने की परवाह नहीं। मेरी इच्छा है एक संस्थान स्थापित करने की जिसमें मैं नई पीढ़ी को ब्लॉक छपाई का ज्ञान दे सकूँ। मैं इस उद्योग के छात्रों के लिए एक छात्रावास भी बनाना चाहता हूँ। मैं इस कला को पूरे विश्व में फैलाना चाहता हूँ ताकि इन प्रिंटों की माँग समस्त विश्व में बढ़ें।”

प्राकृतिक हस्त छपाई का तरीक़ा

१) बगरू प्रिंट हल्के पीले, सफ़ेदी वाले पीले रंग की पृष्ठभूमि पर होता है। पहले कपड़े को हल्दी पाउडर व पानी से रंगा जाता है। सूखने पर यह पुन: प्रिंट के लिए तैयार होता है।

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२) बगरू प्रिंट में काले, लाल व मैरून रंग प्रयोग होते हैं। ये रंग प्राकृतिक तैयार किये जाते हैं। काला रंग घोड़ों व ऊँटों की नाल को पानी में डुबोकर, लाल रंग गोंद व फिटकरी से, मैरून उक्त दोनों रंगों को मिलाकर प्राप्त किया जाता है।

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३) लकड़ी के ब्लॉक विशेष से कपड़े पर एक निश्चित दबाव पर विभिन्न डिज़ाइन बनाये जाते हैं। इन डिज़ाइनों में एक रूपता, इस्तेमाल रंगों की संख्या पर कपड़े की क़ीमत का निर्धारण होता है।

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४) छपाई के बाद कपड़े एक दिन सूरज की रोशनी में सुखाये जाते हैं।

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५) सूखने पर इन्हें सादे पानी में धोया जाता है।
६) रंगों को पक्का करने के लिए कपड़े को पीतल के बर्तन में गरम पानी में डुबाया जाता है।
७) पुन: कपड़े को सुखाते हैं। अन्तत: कपड़ा तैयार होता है। यह ब्लॉक प्रिंटिग की दुनिया की सबसे धीमी स्वभाविक प्रक्रिया है।
८) बागरू, डाबू और सॉंगानेरी प्रिंट के लिए अलग अलग हस्त ब्लॉक प्रिंट एवं तरीक़े अपनाये जाते हैं।

इस उद्योग के अस्तित्व में आपका योगदान

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१) केवल विश्वसनीय हस्त प्रिंट ही ख़रीदें। रासायनिक रंगों व स्क्रीन प्रिंट से बचें।
२) कोशिश करें उत्पाद सीधे छपाईकारों से ही ख़रीदें।
३) इन छपाईकारों से मिलकर उनका उत्साह बढ़ाये ताकि वे इस विशेष छपाई कला को ज़्यादा गति दें।
४) इक कला का प्रचार, प्रसार करें।
५) इस कला के बारे ज़्यादा जानने के लिए आप जयपुर के ‘Anokhi Textile Museum’ जायें।
६) लोगों में विश्वसनीयता एवं मूल हस्त ब्लॉक छपाई की जानकारी बढ़ाये ताकि उपभोक्ता उनकी पहचान कर सकें।

लाल चन्द कहते हैं “सरकार स्कूलों में छात्रों को इस कला व सभ्यता को समझने की शिक्षा दे। इससे वे इस कला के प्रति सम्मान प्रदान कर समर्पित होंगे। सरकार को हस्तकरघा क्षेत्र को ट्रेड मार्क प्रदान करना चाहिये, क्योंकि कई बार ट्रेड मार्क ही लोगों में उत्पाद के प्रति विश्वास पैदा करता है।”

मूल हस्त ब्लॉक छपाई की पहचान कैसे हो?

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१) हाथ से छपाई के कारण मूल हस्त ब्लॉक प्रिंट में थोड़ी असमानता छपाई में दिखायी देते हैं। जबकि स्क्रीन प्रिंटिग में छपाई समान रूप में होती है।
२) मूल छपाई में इधर उधर रंगों के छींटे भी पड़े होंगे।
३) हस्त छपाई होने के कारण डिज़ाइन में समानता नहीं होगी। यह थोड़ी सही स्थान से हटी होगी। स्क्रीन प्रिंटिग में ऐसा नहीं होता
४) स्क्रीन प्रिंटिग कपड़े के एक बड़े हिस्से पर छपाई होती है जिससे डिज़ाइन एक समान दिखता है। हस्त ब्लॉक छपाई छोटे छोटे हिस्से में होती है अत: छपाई थोड़ी इधर उधर हो जाती है।
५) स्क्रीन प्रिंटिग में रंगों की विविधता होती है। जबकि मूल हस्त छपाई में सीमित रंग (लाल, पीला, हरा, काला) ही होते हैं।
६) प्राकृतिक रंग केवल हल्के पीले या पीली पृष्ठभूमि बाले कपड़े पर ही चढ़ते हैं, जबकि रासायनिक रंग सफ़ेद कपड़े पर भी चढ़ सकते हैं।
७) मूल हस्त ब्लॉक प्रिंटिग के रंग ब्रुश से भरे जैसे लगते हैं।

इस विधा के बारे में आकाश कमथान द्वारा निर्मित “देखा अनदेखा” वृत चित्र कुछ जाना जा सकता है।

आप छपाईकार राजकुमार धनोपिया से उनके फ़ोन नं0 +91 9784630373 और लाल चन्द जी से उनकी website के माध्यम से सम्पर्क कर सकते हैं।

आपको यदि इन छपाईकारों की इस कहानी से इनके प्रति कुछ प्रेरक प्रसंग मिला है और आपके पास भी ऐसे ही प्रेरक प्रसंग हैं तो कृपया हमें लिखें ताकि हम आपको उन विश्वसनीय सही लोगों से मिलवा सकें और हम भी मिल सकें।
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फ़ोटो: विश्वास पारीक
अनुवाद: बालेंद्र शेखर



“डब्बा ढोल” – खुले में शौच उन्मूलन की अनोखी दास्ताँ

मध्य प्रदेश राजपुर के नया खेड़ा गॉंव वासी जब सो रहे होते हैं, १५ साल का प्रदीप मेवाड़ एक विशेष अभियान का नेतृत्व करता है। वह बच्चों के साथ सुबह जल्दी जागकर खुले में शौच करने मैदान की ओर जाने वाले गॉंव वालों के पानी से भरे बरतन, बोतल आदि को गिरा देते हैं, इससे वे शौच के बाद ख़ुद को साफ़ नहीं कर पाते। अन्तत: परेशान होकर ही सही परन्तु उन्मुक्त शौच का विचार त्याग देते हैं।

“मैं सुबह ५ बजे उठकर अपनी बाल सेना के सदस्यों को सीटी बजाकर अभियान पर चलने का संकेत देता है,”प्रदीप ने बताया। लगभग १० सदस्यों की टोली विभिन्न दिशाओं में जाकर खुले में शौच करने वालों को रोकतीं हैं। प्रदीप कहते हैं, “लोग इससे बहुत नाराज़ होते हैं, वे हमारे घरों पर आकर हमें गालियॉं देते हुए धमकाते हैं। यहाँ तक कि वे हमारे घरवालों को भी भला बुरा कहते हैं। परन्तु हमारा कार्य रूकता नहीं”।

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हालाँकि कभी प्रदीप भी उन्मुक्त शौच पद्धति का अनुयायी था। परन्तु ‘समर्थन’ संस्था द्वारा गॉंव में सफ़ाई अभियान पर आयोजित एक कार्यक्रम देखने के बाद उसके व्यवहार में बदलाव आया। क्योंकि अब वह इस आदत के दुष्परिणामों एवं समस्याओं को समझने लगा था। “अभी तक हम गॉंव में खुले में शौच से आने वाली बीमारियों से अनभिज्ञ थे। गॉंव के लोग अक्सर अतिसार, अतिक्रमण बुखार जैसी बीमारियों से ग्रसित रहते थे। मैंने महसूस किया यह उन्मुक्त शौच का ही दुष्परिणाम है”। इसी से लड़ने के लिए दिस्मबर २०१५ में प्रदीप ने ‘डिब्बा डोल’ नामक १० सदस्यों की एक टीम बनायी।

आँकड़े क्या कहते हैं

UNICEF के अनुसार शौचालयों का प्रयोग न करने का वातावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है जो बच्चों में डायरिया जैसी अनेक बीमारियों को निमंत्रण देता है। इससे भारत में प्रत्येक दिन ५ वर्ष से कम उम्र के लगभग ४०० बच्चे मौत का शिकार हो जाते हैं। आज भी भारत की आधी लगभग ५६.४ करोड़ जनता खुले में शौच करती है।

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इस क्षेत्र में कुछ अच्छे परिवर्तन देखने को मिले हैं। NSSO के अनुसार अब शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में बडौतरी हुई है। जहाँ १९९२, ८५% ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय नहीं थे, २०१२ में यह आँकड़ा ५९.४% तक आ गया है। हालाँकि इनका पूरा उपयोग अभी भी नहीं हो पा रहा है। अभी प्रतिदिन उपयोग के लिए तमाम शौचालयों एवं उनके उपयोग की जागरूकता लाने की आवश्यकता है।

Ministry of Drinking Water & Sanitation के अन्तर्गत All India Base Line के २०१२-१३ के सर्वेक्षण के अनुसार भारत वर्ष में ७.४१ करोड़ घरों के मुक़ाबले १.३९ करोड़ घर ही इसका इस्तेमाल करते हैं। क्या हमें शौचालय निर्माण के साथ साथ लोगों की सोच में बदलाव लाने की ज़रूरत नहीं है? यहीं पर “डब्बा डोल” ने एक सही दिशा में क़दम उठाया है।

शौचालय जाने में जागरूकता

प्रदीप ने गॉंव वालों को जागरूक करना शुरू तो किया परन्तु पुरानी आदतें जल्द नहीं बदलतीं। गॉंव वालों को एक बच्चे का समझाना स्वीकार न था। उन्होंने उसकी बात मानने से मना कर दिया। लेकिन प्रदीप यह परिवर्तन लाने पर अडिग था। उसके सतत प्रयासों के सुपरिणाम आये, धीरे धीरे लोग उसे सुनने लगे। गॉंव के प्रहलाद सिंह कहते है कि “पहली बार जब बच्चों ने मेरा पानी गिरा दिया, मुझे बहुत ग़ुस्सा आया परन्तु मैंने महसूस किया वे सही कर रहे हैं। हमें अपनी आदतें बदलनी ही चाहिएँ, इसके बाद मैंने अपने घर में शौचालय बनवाया”।

प्रदीप एक घटना बताता है, “एक बार उसके पड़ौसी ने मेरी व मेरे साथियों की पिटाई लगा दी, परन्तु हम नहीं बदले। लेकिन जब सभी गॉंव वाले हमें धमकाने लगे, तो हमने गॉंव के सरपंच से मुलाक़ात की। सरपंच जी ने हमें प्रोत्साहित किया, वे कई बार हमारे साथ भी गये। इससे युवा समर्थक भी इस जागरूकता अभियान में हमारी सहायता करने लगे”।

उसके अनुसार, “लगभग ३ महीने तक लोगों के दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं आया, वे मेरे से घृणा करने लगे। मेरे पिताजी मुझे लेकर चिन्तित थे। वे मुझे इस काम से अलग होने को कहने लगे। परन्तु मेरी मॉं ने मेरा हौसला बढ़ाया”। धीरे धीरे लोग मुझे सुनने लगे, अब वे खुले में शौच के दुष्परिणाम भी समझने लगे।

सफलता की शुरूआत

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उसके पिता पहले व्यक्ति थे जिन्होंने उसके कार्य की प्रमुखता को समझा और प्रदीप के घर में गॉंव का पहला शौचालय बना। अब गॉंव के हर घर में शौचालय है और अब नया खेड़ा गॉंव खुला शौच मुक्त गॉंव बन गया है।

शौचालय बनने पर इस टीम के सामने पर्याप्त पानी न होना एक अन्य समस्या थी। बच्चों ने सरकार से मदद की गुहार लगायी परिणाम हुआ गॉंव में पानी की समस्या हल करने के लिए एक बोर वेल खुदवाया गया।

अब प्रदीप के पिता अजब सिंह मेवाड़ कहते हैं “मुझे अपने बेटे के कार्य और उपलब्धियों पर गर्व है। वह सही दिशा में कार्य कर रहा है”।

धीरे धीरे यह आन्दोलन आसपास के गाँवों में भी फैल चुका है। तमाम बच्चे प्रदीप के मिशन में शामिल हो रहे हैं, लगभग १० से १२ गाँवों में उसकी टीम कार्य कर रही है। टीम के एक सदस्य का कहना है “हमारा स्कूल सुबह ८ बजे शुरू होता है, हमने कई समूह बनाये हैं जो अलग अलग बस्तियों में जाकर पक्का करते हैं कि कोई खुले में शौच तो नहीं जाता।

जहाँ सड़क के किनारे व झाड़ियों में गन्दगी रहती थी वहॉं दीवारों पर इस जीवनदायी आदत के बारे में संदेश लिखे गये हैं। लगभग ३०० घरों में अपने शौचालय हैं। निश्चित ही यह यात्रा आसान नहीं है। प्रदीप कहता है “तमाम प्रयासों एवं परिश्रम से हम यहाँ तक पहुँचे हैं। एक समय था हम नहीं जानते थे हम क्या करें। लोग हमें सुनना भी नहीं चाहते थे लेकिन बुलन्द इरादों ने हमें यह परिवर्तन दिखाया है, हम इसे अधर में नहीं छोड़ेंगे।

जो गॉंव वाले कभी उसे भला बुरा कहते थे, आज सराहना करते हैं। अभी भी पुराने लोग शौचालयों का उपयोग करने से कतराते हैं व कभी कभी खुले में शौच चले जाते हैं। प्रदीप कहता है “सरकार व अनेक व्यक्ति इसमें परिवर्तन के लिए प्रयत्नशील हैं। हालात बदल रहे हैं फिर भी बड़े स्तर पर लोगों की मानसिक्ता बदलने की आवश्यकता है”। प्रदीप ११वीं का छात्र है वह इस सफ़ाई अभियान में अपना भविष्य बनाना चाहता है।

प्रदीप को कई क्षेत्रों में उचित मार्ग दर्शन की आवश्यकता है। उसका कहना है वास्तव में वह गाँवों में बड़े बदलाव की दिशा में कार्य कर रहा है। इसमें उसे तमाम स्वयं सेवक बच्चों की आवश्यकता है जो इस कार्य में भारतवर्ष को उन्मुक्त शौच मुक्त भारत बनाने में उसका सहयोग कर सकें।

यदि आप भी इस यज्ञ में अपना कोई भी योगदान देना चाहते हैं तो हमें “thestoriesofchange@gmail.com पर लिखें, हम आपको प्रदीप से सम्पर्क कराने में पूर्ण सहयोग देंगे।




गुजरात का बंजारा समुदाय – कैसे एक समाज सुधारक महिला उनके जीवन में ख़ुशियाँ ला पायी

बंजारा परिवार की एक शाम – गुजरात के कुछ स्थानीय बदमाश ‘राधा’ को उसके परिवार व बच्चों के सामने ही उठा ले जाते हैं। परन्तु परिवार वालों की ऐसी प्रतिक्रिया थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं। पुलिस में भी उन्होंने कोई शिकायत दर्ज कराने की ज़रूरत नहीं समझी।

पूछने पर राधा के परिवार का एक सदस्य बताता है वे उसे अगली सुबह या एक दो दिन में छोड़ जायेंगे। बंजारा समाज में राधा के साथ जैसी होने वाली घटनाएँ आम बात थी। एक व्यक्ति कहता है “हम शिकायत किसे करें सरकार और लोंगों द्वारा हम उपेक्षित लोग हैं। हमारी तरह के बंजारों की कोई पहचान ही नहीं।”

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ओढ़व, अहमदाबाद के समीप एक बंजारा बस्ती

उक्त घटना मीतल पटेल नाम की एक समाज सुधारक महिला पत्रकार के सामने घटी थी, उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। हम कैसे स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं। उसने उसी समय कुछ करने का निर्णय लिया। मीतल कहती है “मैं उस घटना को भुला न पायी। मैं वापस शहर तो आयी परन्तु वहॉं दुबारा जाने के लिए। मैंने ४५ दिन तक उन बंजारों के बीच रहकर उनके लिए कुछ करने की ठान ली थी”। मीतल उन के हालातों के लिए एक मंच बनाना चाहती थी जिसके लिए वह भागा दौड़ी करती परन्तु तमाम समझाने पर भी बंजारे उस पर विश्वास न जमा सके। धीरे धीरे मीतल का उनके प्रति समर्पण एवं जुनून देखकर यह शून्य अब भरने लगा था। यहीं से मीतल की यात्रा शुरु हुई।

कैसे यह सब सम्भव हो सका
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मित्तल पटेल

मीतल ने अब बस से यात्रा करनी शुरू की, वह अन्जान जगहों पर पड़े उनके डेरों पर उतर जाती। उनसे बातचीत करती और सम्भव समाधानों पर कार्य शुरू कर देती। उन बंजारों की कोई पहचान न थी, इसीलिए पुलिस कोई भी अपराध होने पर अकसर उन्हें ही प्रताड़ित करती। कभी कभी तो उनके डेरे तक जला दिए जाते। किसी स्थाई क्षेत्र में डेरे न होने से वे उपेक्षित, प्रताड़ित एवं वेघर जीवन जीने को मजबूर थे। जब तमाम सरकारी दफ़्तरों और N.G.O.’s पर पहुँच करने पर भी वह कुछ न कर सकी तब उसने अकेले ही आगे बढ़ने की सोची। यह वर्ष २००६ की बात है। बंजारों के बीच काम करते करते वर्ष २०१० में उसने “विचरता समुदाय समर्थन मंच” (VSSM) नामक संगठन बनाया, तब से पटेल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

खोई पहचान दिलाई

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मीतल के लिए बड़ी चुनौती थी बंजारो  को उनकी पहचान को बनाना। पटेल का कहना था “उन्हें पहचान पत्र दिलवाना एक मुश्किल कार्य था, क्योंकि वे जल्दी ही अपना स्थान बदलते रहते थे। उनका कोई स्थायी निवास नहीं था। बंजारे पूरे वर्ष घूमते रहते लेकिन मानसून के दौरान वे एक निश्चित स्थान पर आकर रहते थे।” मीतल ने वही स्थान उनके निवास के साक्ष्य के लिए इस्तेमाल किया। यह सोच रंग लायी व सरकार ने इसे मानकर उन्हें पहचान पत्र देना शुरू कर दिया। अभी तक VSSM उन्हें ७० हज़ार वोटर कार्ड और ५ हज़ार राशन कार्डदिलवा चुकी है।

इसके बाद पटेल ने बंजारों को पक्के घर दिलवाने की शुरूआत की। गुजरात सरकार से प्राप्त सहायता से संगठन उन्हें अभी तक ३०० घर मीतल दिलवा चुकी है।

बाल शिक्षा, वेश्यावृत्ती से मुक्ति, व्याज मुक्त ऋण व अन्य सुविधायें

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VSSM की मदद से मीतल ने बंजारों के मध्य उनके बच्चों के लिए टैन्ट स्कूल की शुरूआत की। मीतल कहती हैं “क्योंकि बंजारे बस्ती बस्ती घूमते थे, उन्हीं के बीच उन्होंने टैन्ट स्कूल खोले। जब बच्चों ने पढ़ना शुरू किया मॉं बाप में उनकी शिक्षा को लेकर एक सकारात्मक सोच बनने लगी। अब वे मुझसे अपने बच्चों के लिए एक छात्रावास की बात करते जिससे वे अच्छे से पढ़ सकें”। पटेल ने एक छात्रावास खोल जिसमें आज ३५० बच्चे रहते हैं।

मीतल ने गुजरात के वानसकॉठा जिले के वाडिया गॉंव का दौरा किया जहाँ इस समाज की ज़्यादातर लड़कियॉं वेश्यावृत्ती में लिप्त थीं। VSSM ने उन्हें व्याज मुक्त ऋण देकर अनेक रोज़गार की सम्भावनाओं को तलाशा व उन्हें रोज़गार करने को प्रोत्साहित किया। सामूहिक विवाहों का आयोजन करवाकर लड़कियों को सम्मानित जीवन जीने के अवसर प्रदान किये।

पटेल कहती हैं “अभी और कठिन चढ़ाई चढ़नी है। हम देखते हैं तमाम SC, ST समुदायों में वर्षों के सतत प्रयासों के सकारात्मक परिणाम मिले हैं। इस क्षेत्र में यह हमारी शुरूआत है, स्थायी परिणाम देखने के लिए लम्बा समय चाहिये”।

सकारात्मक प्रभाव

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इस छोटी सफलता के साथ मीतल की यात्रा चालू है। जो बंजारे कभी उन पर हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ बोलते तक नहीं थे, आज अपने अधिकारों की आवाज़ उठाने लगे हैं। पिछले दिनों १५० बंजारों ने गॉंधीनगर जाकर Ministry for Social Justice & Employment में मंत्री जी से अपने लम्बित मामलों को हल करने की बात की।

पटेल कहती हैं, “किसी से प्रश्न करना उनमें बड़ा परिवर्तन दर्शाता है।” गीता बैजनिया और उसका परिवार वातवा के गरवी गॉंव के बाहर रहता है। गीता आस पास के घरों में साफ़ सफ़ायी एवं आया का काम करती थी। परिवार का बड़ी मुश्किल से गुज़ारा हो पता था। VSSM ने उसके पति को आँटो रिक्शा के लिए ऋण दिया है। गीता ने भी  उनसे कुछ पैसे लेकर घर के सामने एक छोटी दुकान शुरू कर दी है।इसी प्रकार अनेक सदस्य हैं जो इससे सहायता प्राप्त कर रहे हैं। जीवावाई में जोड़ने की आदत बन गयी है वह कहती हैं ” मुझे बचत की ज़रूरत अब पता लगी है अब मेरे पास १७०००/- के ज़ेवर और १५००/- नक़द हैं”।

मीतल कहती हैं, “यह एक शुरूआत है। मैं लम्बी यात्रा पर हूँ, लेकिन मुझे सकारात्मक परिवर्तन दिख रहा है”।
“The Stories of Change” इस उक्ति के साथ मीतल पटेल को शुभकामनायें देती है कि
” आत्म प्रेरित सौदेश्य श्रम ही सफल जीवन है”

अनुवाद – बालेंद्र शेखर



१५ वर्षीय अन्जू रानी की अपने गाँव के बच्चों की बाल श्रम मुक्ति दास्ताँ

हरियाणा के दौलतपुर गाँव की १५ वर्षीय अन्जू रानी गम्भीर, वेदना भरे चेहरे से बताती है, “लम्बे समय तक अपने परिवार में असमान व्यवहार को तब मैंने जान लिया था जब मेरी मॉं घर में एक सेब होने पर उसे मेरे भाई को दे देती थी। लड़के लड़की का यह अन्तर मैं महसूस करती और सोचने पर मजबूर हो जाती यह व्यवहार अनुचित और अपराध तुल्य है। एक दिन बातों बातों में मैंने मॉं को अहसास करा ही दिया कि एेसा व्यवहार माता पिता को जेल तक दिखा सकता है।”

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दौलतपुर  की तरह अनेकों गाँव बाल मज़दूरी, अशिक्षा, असमानता जैसे कई अभिशापों से जूझ रहे थे, विशेषकर दौलपुर की बच्चियॉं उपेक्षित जीवन जीने को मजबूर थीं।

“अगर मैं सच बोल रही हूँ तो मैं क्यूँ डरूँ?” अंजु ने निर्भिकता से कहा। अंजु ने अनेकों लड़कियों को स्कूल जाने के लिए मदद का भरोसा देकर प्रोत्साहित किया है। आज पुराने ख़्याल रखने वाले बुज़ुर्ग ना सिर्फ़ अंजु की बात सुनते हैं बल्कि उसकी सहायता भी करते हैं। लेकिन अंजु यहाँ तक कैसे पहुँची? अंजु रानी ने क्या किया? कैसे उसने एक पिछड़े हुए समाज की सोच को बदला?

इस कथानक को थोड़ा पीछे लिए चलते हैं दिसम्बर २०१५। अन्जू की सहेलियों घर के काम काज के कारण स्कूल के मिले काम को भी समय नहीं दे पा रही थीं। उनके माँ बाप को भी उनकी शिक्षा की चिन्ता न थी। सहेलियों उलाहना देतीं ” हमारा भाग्य तुम्हारे जैसा कहॉं तुम्हारे घरवालों ने तुम्हें पढ़ाई करने की छूट दे दी है। यदि तुम हमारी जगह हमारे घरवालों को समझा सको तभी कुछ बदलाव सम्भव है।”

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अन्जू अपनी सहेलियों की अशिक्षा को सहन नहीं कर पा रही थी, अब उसने कुछ कर गुज़रने की ठान ली थी। ऐसे में एक दिन “Save The Children” नाम की संस्था ने उनके गाँव में बच्चों के तमाम अधिकारों पर एक गोष्ठी में चर्चा की। अन्जू का मानना है इससे पहले वह इन अधिकारों का कोई ज्ञान न था। इससे प्रेरित हो उसने “कोमल हाथ क़लम के साथ” नामक बच्चों का संगठन बनाकर एक नये अभियान की शुरुआत की इस निश्चय के साथ कि उनके घरवाले अब उनकी शिक्षा बाधा नहीं बन सकेंगे।

अन्जू द्वारा सहेलियों के घरवालों को समझाने पर उनमें कोई बदलाव आना तो दूर उल्टे उसे ही भला बुरा कहना शुरु कर दिया कि वह बच्चों को विगाड रही है, आगे से यहाँ नहीं आना आदि आदि। इससे वह कुछ निराश तो ज़रूर हुई उसके घरवालोंने भी उसे ही समझाया कि अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो दूसरों की मत सोचो। परन्तु अन्जू शांत नहीं रही उसने बाल अधिकार एवं उत्थान पर कई लेख पढ़े।

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इन सबसे ज्ञान बढ़ाकर उसने “भय विन होत न प्रीत” वाले सिद्धान्त को अपनाना उचित समझा। मात्र समझा ही एक रास्ता नहीं क़ानूनी सहायता लेना भी ज़रूरी है। परन्तु अकेले यह सम्भव न था अत: उसने गाँव के सरपँच से बाल अधिकारों पर चर्चा कर अपने पक्ष में किया और बताया कि कैसे घरवाले अपनी बच्चियों को स्कूल छुड़ा देते हैं। अब सरपँच जी के साथ घर घर जाकर अन्जू ने उन्हें समझाना शुरु किया। अन्जू कहती है “हम उनके घरों में गये औरउन्हें इसके विरुद्ध जाने पर जेल भिजवाने की धमकी तक दी तब जाकर मेरी सहेलियों न केवल स्कूल जाने लगीं बल्कि समय से स्कूल का काम भी पूरा करने लगीं। इसके सुपरिणाम मिलने लगे ३३%  तक ही नम्बर लाने वाली कविता के ५८% नम्बर आये। घर के वातावरण में भी सुधार आने लगा।

गॉंव वाले अभी तक बच्चों के निर्णयों को गम्भीरता से नहीं लेते थे, परन्तु सरपंच जी के साथ होने से लोगों की सोच में बदलाव आया अब वे उनके निर्णयों को गम्भीरता से लेने लगे। परिवर्तन दिखने लगा अनेक परिवार अपने बच्चों को नियम से स्कूल भेजने लगे।

उत्साहित अन्जू ने गॉंव के सरपंच जी को साथ लेकर १० सदस्यों की एक “Child Protection Committee” नाम की एक समिति का गठन किया जो घर घर जाकर बच्चियों से कम काम लेने को प्रेरित करती है।

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मंज़िल और भी थीं अन्जू ने बाल श्रमिक जैसी कुरीतियाें को गॉंव से ख़त्म करने की ओर ध्यान दिया, राह मुश्किल थी क्योंकि फ़सल के समय मज़दूर न मिलने के कारण बड़े किसान तमाम परिवार के बच्चों को कम मज़दूरी देकर ज़्यादा काम लेने को प्रोत्साहित कर उनका शोषण करते हैं। परिणामत: बच्चों स्कूल व शिक्षा से दूर होते जाते हैं। परिवार वाले आर्थिक सम्पन्न न होने के कारण बच्चों को अपनी पूँजी एवं आय का साधन मानने लगते हैं। अक्सर पाँचवीं पास करते करते वे उन्हें स्कूल से हटा लेते हैं उनका मानना होता कि अब वे मज़दूरी करने लायक हो गये हैं। “Smile Foundation” के आँकड़ों के अनुसार भारत में ९०% ग्रामीण बाल श्रमिकों में से ८०% कृषि कार्यों में लगे हैं।

अन्जू एक संस्मरण बताती है उसके गॉंव में एक परिवार देर तक अपने बच्चों को कृषि कार्य में लगाये रखता। मैं निडर होकर उस परिवार वालों से मिली और बाल श्रम सम्बन्धी क़ानून के बारे में बताया। उन्हें शिक्षा के सकारात्मक पहलू भी बताये साथ ही न मानने पर क़ानून की धमकी भी दी। वो परिवार जो १५ दिन के लिए कार्य करने गाँव में आया था वो  तीन दिन में ही इस वादे के साथ वापस लौट गया कि अब वह बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देगा। परन्तु अन्जू अभी भी आशंकित थी इसलिए उसने अपनी सहेली को उस परिवार पर नज़र रखने को कहा। प्रसन्नता है उन्होंने बच्चों को स्कूल में दाख़िला दिलाकर स्कूल भेजना शुरु कर दिया है। अन्जू अभी उनके सम्पर्क में रहती है, उसका कहना है “मेरा लक्ष्य बाल श्रम अपने गॉंव से ही नहीं हर जगह से ख़त्म करना है। यह सार्वभौमिक समस्या जो मुझे सीमाबद्ध नहीं कर सकती।

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हम अन्जू के अथक प्रयासों के आभारी अनेक बड़े किसानों ने अपने खेतों के आगे सड़क पर नोटिस बोर्ड लगा दिए हैं”हम बाल श्रमिक अपने फ़ार्म पर नहीं रखते”

गॉंव में बाल श्रम की माँग न होने से अब उनके बच्चे स्कूल जाते हैं। गॉंव वालों की। सोच भी बदली है। अब वे लड़के लडकियों में अन्तर नहीं रखते। लड़कियों को घर से बाहर जाने पर भी पाबन्दी नहीं है। अन्जू गर्व से कहती है कभी गॉंव में मैं अकेली साइकिल वाली लड़की थी पर आज गिनना मुश्किल है।

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यात्रा आसान नहीं है। अन्जू के अथक प्रयास दृढ़ निश्चय का परिणाम है आज उसके सभी आलोचक   उसकी तारीफ़ों के पुल बॉंधते हैं। अन्जू कहती है “आज मेरे परिवार में भी परिवर्तन है मेरी मॉं के लिए मैं और मेरा भाई एक समान हैं वह जितना प्यार मेरे भाई से करती है उतना ही मुझसे करती है।”

अन्जू की यात्रा की यह नई शुरुआत है। अन्तहीन यात्रा में अभी भी अनेक पारम्परिक बाधाएँ है परन्तु जहाँ चाह है वहाँ राह है। आज भी अन्जू गॉंव गॉंव यह अलख जगाती है। अन्जू कहती है परिवर्तन एक दिन में सम्भव नहीं।

अन्जू का मानना है गॉंव गॉंव जाने अनेकों आर्थिक, सामाजिक व शारीरिक समस्यायें आतीं हैं। प्रसन्नता का विषय है “Ashoka” जैसी अन्तरराष्ट्रीय संस्था ने अपने “Youth Venture Program” के अन्तर्गत अन्जू का चयन किया है जिससे वह बहुत प्रोत्साहित है।

“The Stories of Change” इन पंक्तियों के साथ अन्जू को शुभकामनायें देती है कि

                    जीवन  का उद्देश्य  नहीं है  शान्त  भुवन में टिक रहना।

                    किन्तु पहुँचना उस मंज़िल तक जिसके आगे राह नहीं।।

अनुवाद – बालेंद्र शेखर

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