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“डब्बा ढोल” – खुले में शौच उन्मूलन की अनोखी दास्ताँ

मध्य प्रदेश राजपुर के नया खेड़ा गॉंव वासी जब सो रहे होते हैं, १५ साल का प्रदीप मेवाड़ एक विशेष अभियान का नेतृत्व करता है। वह बच्चों के साथ सुबह जल्दी जागकर खुले में शौच करने मैदान की ओर जाने वाले गॉंव वालों के पानी से भरे बरतन, बोतल आदि को गिरा देते हैं, इससे वे शौच के बाद ख़ुद को साफ़ नहीं कर पाते। अन्तत: परेशान होकर ही सही परन्तु उन्मुक्त शौच का विचार त्याग देते हैं।

“मैं सुबह ५ बजे उठकर अपनी बाल सेना के सदस्यों को सीटी बजाकर अभियान पर चलने का संकेत देता है,”प्रदीप ने बताया। लगभग १० सदस्यों की टोली विभिन्न दिशाओं में जाकर खुले में शौच करने वालों को रोकतीं हैं। प्रदीप कहते हैं, “लोग इससे बहुत नाराज़ होते हैं, वे हमारे घरों पर आकर हमें गालियॉं देते हुए धमकाते हैं। यहाँ तक कि वे हमारे घरवालों को भी भला बुरा कहते हैं। परन्तु हमारा कार्य रूकता नहीं”।

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हालाँकि कभी प्रदीप भी उन्मुक्त शौच पद्धति का अनुयायी था। परन्तु ‘समर्थन’ संस्था द्वारा गॉंव में सफ़ाई अभियान पर आयोजित एक कार्यक्रम देखने के बाद उसके व्यवहार में बदलाव आया। क्योंकि अब वह इस आदत के दुष्परिणामों एवं समस्याओं को समझने लगा था। “अभी तक हम गॉंव में खुले में शौच से आने वाली बीमारियों से अनभिज्ञ थे। गॉंव के लोग अक्सर अतिसार, अतिक्रमण बुखार जैसी बीमारियों से ग्रसित रहते थे। मैंने महसूस किया यह उन्मुक्त शौच का ही दुष्परिणाम है”। इसी से लड़ने के लिए दिस्मबर २०१५ में प्रदीप ने ‘डिब्बा डोल’ नामक १० सदस्यों की एक टीम बनायी।

आँकड़े क्या कहते हैं

UNICEF के अनुसार शौचालयों का प्रयोग न करने का वातावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है जो बच्चों में डायरिया जैसी अनेक बीमारियों को निमंत्रण देता है। इससे भारत में प्रत्येक दिन ५ वर्ष से कम उम्र के लगभग ४०० बच्चे मौत का शिकार हो जाते हैं। आज भी भारत की आधी लगभग ५६.४ करोड़ जनता खुले में शौच करती है।

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इस क्षेत्र में कुछ अच्छे परिवर्तन देखने को मिले हैं। NSSO के अनुसार अब शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में बडौतरी हुई है। जहाँ १९९२, ८५% ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय नहीं थे, २०१२ में यह आँकड़ा ५९.४% तक आ गया है। हालाँकि इनका पूरा उपयोग अभी भी नहीं हो पा रहा है। अभी प्रतिदिन उपयोग के लिए तमाम शौचालयों एवं उनके उपयोग की जागरूकता लाने की आवश्यकता है।

Ministry of Drinking Water & Sanitation के अन्तर्गत All India Base Line के २०१२-१३ के सर्वेक्षण के अनुसार भारत वर्ष में ७.४१ करोड़ घरों के मुक़ाबले १.३९ करोड़ घर ही इसका इस्तेमाल करते हैं। क्या हमें शौचालय निर्माण के साथ साथ लोगों की सोच में बदलाव लाने की ज़रूरत नहीं है? यहीं पर “डब्बा डोल” ने एक सही दिशा में क़दम उठाया है।

शौचालय जाने में जागरूकता

प्रदीप ने गॉंव वालों को जागरूक करना शुरू तो किया परन्तु पुरानी आदतें जल्द नहीं बदलतीं। गॉंव वालों को एक बच्चे का समझाना स्वीकार न था। उन्होंने उसकी बात मानने से मना कर दिया। लेकिन प्रदीप यह परिवर्तन लाने पर अडिग था। उसके सतत प्रयासों के सुपरिणाम आये, धीरे धीरे लोग उसे सुनने लगे। गॉंव के प्रहलाद सिंह कहते है कि “पहली बार जब बच्चों ने मेरा पानी गिरा दिया, मुझे बहुत ग़ुस्सा आया परन्तु मैंने महसूस किया वे सही कर रहे हैं। हमें अपनी आदतें बदलनी ही चाहिएँ, इसके बाद मैंने अपने घर में शौचालय बनवाया”।

प्रदीप एक घटना बताता है, “एक बार उसके पड़ौसी ने मेरी व मेरे साथियों की पिटाई लगा दी, परन्तु हम नहीं बदले। लेकिन जब सभी गॉंव वाले हमें धमकाने लगे, तो हमने गॉंव के सरपंच से मुलाक़ात की। सरपंच जी ने हमें प्रोत्साहित किया, वे कई बार हमारे साथ भी गये। इससे युवा समर्थक भी इस जागरूकता अभियान में हमारी सहायता करने लगे”।

उसके अनुसार, “लगभग ३ महीने तक लोगों के दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं आया, वे मेरे से घृणा करने लगे। मेरे पिताजी मुझे लेकर चिन्तित थे। वे मुझे इस काम से अलग होने को कहने लगे। परन्तु मेरी मॉं ने मेरा हौसला बढ़ाया”। धीरे धीरे लोग मुझे सुनने लगे, अब वे खुले में शौच के दुष्परिणाम भी समझने लगे।

सफलता की शुरूआत

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उसके पिता पहले व्यक्ति थे जिन्होंने उसके कार्य की प्रमुखता को समझा और प्रदीप के घर में गॉंव का पहला शौचालय बना। अब गॉंव के हर घर में शौचालय है और अब नया खेड़ा गॉंव खुला शौच मुक्त गॉंव बन गया है।

शौचालय बनने पर इस टीम के सामने पर्याप्त पानी न होना एक अन्य समस्या थी। बच्चों ने सरकार से मदद की गुहार लगायी परिणाम हुआ गॉंव में पानी की समस्या हल करने के लिए एक बोर वेल खुदवाया गया।

अब प्रदीप के पिता अजब सिंह मेवाड़ कहते हैं “मुझे अपने बेटे के कार्य और उपलब्धियों पर गर्व है। वह सही दिशा में कार्य कर रहा है”।

धीरे धीरे यह आन्दोलन आसपास के गाँवों में भी फैल चुका है। तमाम बच्चे प्रदीप के मिशन में शामिल हो रहे हैं, लगभग १० से १२ गाँवों में उसकी टीम कार्य कर रही है। टीम के एक सदस्य का कहना है “हमारा स्कूल सुबह ८ बजे शुरू होता है, हमने कई समूह बनाये हैं जो अलग अलग बस्तियों में जाकर पक्का करते हैं कि कोई खुले में शौच तो नहीं जाता।

जहाँ सड़क के किनारे व झाड़ियों में गन्दगी रहती थी वहॉं दीवारों पर इस जीवनदायी आदत के बारे में संदेश लिखे गये हैं। लगभग ३०० घरों में अपने शौचालय हैं। निश्चित ही यह यात्रा आसान नहीं है। प्रदीप कहता है “तमाम प्रयासों एवं परिश्रम से हम यहाँ तक पहुँचे हैं। एक समय था हम नहीं जानते थे हम क्या करें। लोग हमें सुनना भी नहीं चाहते थे लेकिन बुलन्द इरादों ने हमें यह परिवर्तन दिखाया है, हम इसे अधर में नहीं छोड़ेंगे।

जो गॉंव वाले कभी उसे भला बुरा कहते थे, आज सराहना करते हैं। अभी भी पुराने लोग शौचालयों का उपयोग करने से कतराते हैं व कभी कभी खुले में शौच चले जाते हैं। प्रदीप कहता है “सरकार व अनेक व्यक्ति इसमें परिवर्तन के लिए प्रयत्नशील हैं। हालात बदल रहे हैं फिर भी बड़े स्तर पर लोगों की मानसिक्ता बदलने की आवश्यकता है”। प्रदीप ११वीं का छात्र है वह इस सफ़ाई अभियान में अपना भविष्य बनाना चाहता है।

प्रदीप को कई क्षेत्रों में उचित मार्ग दर्शन की आवश्यकता है। उसका कहना है वास्तव में वह गाँवों में बड़े बदलाव की दिशा में कार्य कर रहा है। इसमें उसे तमाम स्वयं सेवक बच्चों की आवश्यकता है जो इस कार्य में भारतवर्ष को उन्मुक्त शौच मुक्त भारत बनाने में उसका सहयोग कर सकें।

यदि आप भी इस यज्ञ में अपना कोई भी योगदान देना चाहते हैं तो हमें “thestoriesofchange@gmail.com पर लिखें, हम आपको प्रदीप से सम्पर्क कराने में पूर्ण सहयोग देंगे।




गुजरात का बंजारा समुदाय – कैसे एक समाज सुधारक महिला उनके जीवन में ख़ुशियाँ ला पायी

बंजारा परिवार की एक शाम – गुजरात के कुछ स्थानीय बदमाश ‘राधा’ को उसके परिवार व बच्चों के सामने ही उठा ले जाते हैं। परन्तु परिवार वालों की ऐसी प्रतिक्रिया थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं। पुलिस में भी उन्होंने कोई शिकायत दर्ज कराने की ज़रूरत नहीं समझी।

पूछने पर राधा के परिवार का एक सदस्य बताता है वे उसे अगली सुबह या एक दो दिन में छोड़ जायेंगे। बंजारा समाज में राधा के साथ जैसी होने वाली घटनाएँ आम बात थी। एक व्यक्ति कहता है “हम शिकायत किसे करें सरकार और लोंगों द्वारा हम उपेक्षित लोग हैं। हमारी तरह के बंजारों की कोई पहचान ही नहीं।”

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ओढ़व, अहमदाबाद के समीप एक बंजारा बस्ती

उक्त घटना मीतल पटेल नाम की एक समाज सुधारक महिला पत्रकार के सामने घटी थी, उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। हम कैसे स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं। उसने उसी समय कुछ करने का निर्णय लिया। मीतल कहती है “मैं उस घटना को भुला न पायी। मैं वापस शहर तो आयी परन्तु वहॉं दुबारा जाने के लिए। मैंने ४५ दिन तक उन बंजारों के बीच रहकर उनके लिए कुछ करने की ठान ली थी”। मीतल उन के हालातों के लिए एक मंच बनाना चाहती थी जिसके लिए वह भागा दौड़ी करती परन्तु तमाम समझाने पर भी बंजारे उस पर विश्वास न जमा सके। धीरे धीरे मीतल का उनके प्रति समर्पण एवं जुनून देखकर यह शून्य अब भरने लगा था। यहीं से मीतल की यात्रा शुरु हुई।

कैसे यह सब सम्भव हो सका
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मित्तल पटेल

मीतल ने अब बस से यात्रा करनी शुरू की, वह अन्जान जगहों पर पड़े उनके डेरों पर उतर जाती। उनसे बातचीत करती और सम्भव समाधानों पर कार्य शुरू कर देती। उन बंजारों की कोई पहचान न थी, इसीलिए पुलिस कोई भी अपराध होने पर अकसर उन्हें ही प्रताड़ित करती। कभी कभी तो उनके डेरे तक जला दिए जाते। किसी स्थाई क्षेत्र में डेरे न होने से वे उपेक्षित, प्रताड़ित एवं वेघर जीवन जीने को मजबूर थे। जब तमाम सरकारी दफ़्तरों और N.G.O.’s पर पहुँच करने पर भी वह कुछ न कर सकी तब उसने अकेले ही आगे बढ़ने की सोची। यह वर्ष २००६ की बात है। बंजारों के बीच काम करते करते वर्ष २०१० में उसने “विचरता समुदाय समर्थन मंच” (VSSM) नामक संगठन बनाया, तब से पटेल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

खोई पहचान दिलाई

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मीतल के लिए बड़ी चुनौती थी बंजारो  को उनकी पहचान को बनाना। पटेल का कहना था “उन्हें पहचान पत्र दिलवाना एक मुश्किल कार्य था, क्योंकि वे जल्दी ही अपना स्थान बदलते रहते थे। उनका कोई स्थायी निवास नहीं था। बंजारे पूरे वर्ष घूमते रहते लेकिन मानसून के दौरान वे एक निश्चित स्थान पर आकर रहते थे।” मीतल ने वही स्थान उनके निवास के साक्ष्य के लिए इस्तेमाल किया। यह सोच रंग लायी व सरकार ने इसे मानकर उन्हें पहचान पत्र देना शुरू कर दिया। अभी तक VSSM उन्हें ७० हज़ार वोटर कार्ड और ५ हज़ार राशन कार्डदिलवा चुकी है।

इसके बाद पटेल ने बंजारों को पक्के घर दिलवाने की शुरूआत की। गुजरात सरकार से प्राप्त सहायता से संगठन उन्हें अभी तक ३०० घर मीतल दिलवा चुकी है।

बाल शिक्षा, वेश्यावृत्ती से मुक्ति, व्याज मुक्त ऋण व अन्य सुविधायें

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VSSM की मदद से मीतल ने बंजारों के मध्य उनके बच्चों के लिए टैन्ट स्कूल की शुरूआत की। मीतल कहती हैं “क्योंकि बंजारे बस्ती बस्ती घूमते थे, उन्हीं के बीच उन्होंने टैन्ट स्कूल खोले। जब बच्चों ने पढ़ना शुरू किया मॉं बाप में उनकी शिक्षा को लेकर एक सकारात्मक सोच बनने लगी। अब वे मुझसे अपने बच्चों के लिए एक छात्रावास की बात करते जिससे वे अच्छे से पढ़ सकें”। पटेल ने एक छात्रावास खोल जिसमें आज ३५० बच्चे रहते हैं।

मीतल ने गुजरात के वानसकॉठा जिले के वाडिया गॉंव का दौरा किया जहाँ इस समाज की ज़्यादातर लड़कियॉं वेश्यावृत्ती में लिप्त थीं। VSSM ने उन्हें व्याज मुक्त ऋण देकर अनेक रोज़गार की सम्भावनाओं को तलाशा व उन्हें रोज़गार करने को प्रोत्साहित किया। सामूहिक विवाहों का आयोजन करवाकर लड़कियों को सम्मानित जीवन जीने के अवसर प्रदान किये।

पटेल कहती हैं “अभी और कठिन चढ़ाई चढ़नी है। हम देखते हैं तमाम SC, ST समुदायों में वर्षों के सतत प्रयासों के सकारात्मक परिणाम मिले हैं। इस क्षेत्र में यह हमारी शुरूआत है, स्थायी परिणाम देखने के लिए लम्बा समय चाहिये”।

सकारात्मक प्रभाव

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इस छोटी सफलता के साथ मीतल की यात्रा चालू है। जो बंजारे कभी उन पर हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ बोलते तक नहीं थे, आज अपने अधिकारों की आवाज़ उठाने लगे हैं। पिछले दिनों १५० बंजारों ने गॉंधीनगर जाकर Ministry for Social Justice & Employment में मंत्री जी से अपने लम्बित मामलों को हल करने की बात की।

पटेल कहती हैं, “किसी से प्रश्न करना उनमें बड़ा परिवर्तन दर्शाता है।” गीता बैजनिया और उसका परिवार वातवा के गरवी गॉंव के बाहर रहता है। गीता आस पास के घरों में साफ़ सफ़ायी एवं आया का काम करती थी। परिवार का बड़ी मुश्किल से गुज़ारा हो पता था। VSSM ने उसके पति को आँटो रिक्शा के लिए ऋण दिया है। गीता ने भी  उनसे कुछ पैसे लेकर घर के सामने एक छोटी दुकान शुरू कर दी है।इसी प्रकार अनेक सदस्य हैं जो इससे सहायता प्राप्त कर रहे हैं। जीवावाई में जोड़ने की आदत बन गयी है वह कहती हैं ” मुझे बचत की ज़रूरत अब पता लगी है अब मेरे पास १७०००/- के ज़ेवर और १५००/- नक़द हैं”।

मीतल कहती हैं, “यह एक शुरूआत है। मैं लम्बी यात्रा पर हूँ, लेकिन मुझे सकारात्मक परिवर्तन दिख रहा है”।
“The Stories of Change” इस उक्ति के साथ मीतल पटेल को शुभकामनायें देती है कि
” आत्म प्रेरित सौदेश्य श्रम ही सफल जीवन है”

अनुवाद – बालेंद्र शेखर



१५ वर्षीय अन्जू रानी की अपने गाँव के बच्चों की बाल श्रम मुक्ति दास्ताँ

हरियाणा के दौलतपुर गाँव की १५ वर्षीय अन्जू रानी गम्भीर, वेदना भरे चेहरे से बताती है, “लम्बे समय तक अपने परिवार में असमान व्यवहार को तब मैंने जान लिया था जब मेरी मॉं घर में एक सेब होने पर उसे मेरे भाई को दे देती थी। लड़के लड़की का यह अन्तर मैं महसूस करती और सोचने पर मजबूर हो जाती यह व्यवहार अनुचित और अपराध तुल्य है। एक दिन बातों बातों में मैंने मॉं को अहसास करा ही दिया कि एेसा व्यवहार माता पिता को जेल तक दिखा सकता है।”

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दौलतपुर  की तरह अनेकों गाँव बाल मज़दूरी, अशिक्षा, असमानता जैसे कई अभिशापों से जूझ रहे थे, विशेषकर दौलपुर की बच्चियॉं उपेक्षित जीवन जीने को मजबूर थीं।

“अगर मैं सच बोल रही हूँ तो मैं क्यूँ डरूँ?” अंजु ने निर्भिकता से कहा। अंजु ने अनेकों लड़कियों को स्कूल जाने के लिए मदद का भरोसा देकर प्रोत्साहित किया है। आज पुराने ख़्याल रखने वाले बुज़ुर्ग ना सिर्फ़ अंजु की बात सुनते हैं बल्कि उसकी सहायता भी करते हैं। लेकिन अंजु यहाँ तक कैसे पहुँची? अंजु रानी ने क्या किया? कैसे उसने एक पिछड़े हुए समाज की सोच को बदला?

इस कथानक को थोड़ा पीछे लिए चलते हैं दिसम्बर २०१५। अन्जू की सहेलियों घर के काम काज के कारण स्कूल के मिले काम को भी समय नहीं दे पा रही थीं। उनके माँ बाप को भी उनकी शिक्षा की चिन्ता न थी। सहेलियों उलाहना देतीं ” हमारा भाग्य तुम्हारे जैसा कहॉं तुम्हारे घरवालों ने तुम्हें पढ़ाई करने की छूट दे दी है। यदि तुम हमारी जगह हमारे घरवालों को समझा सको तभी कुछ बदलाव सम्भव है।”

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अन्जू अपनी सहेलियों की अशिक्षा को सहन नहीं कर पा रही थी, अब उसने कुछ कर गुज़रने की ठान ली थी। ऐसे में एक दिन “Save The Children” नाम की संस्था ने उनके गाँव में बच्चों के तमाम अधिकारों पर एक गोष्ठी में चर्चा की। अन्जू का मानना है इससे पहले वह इन अधिकारों का कोई ज्ञान न था। इससे प्रेरित हो उसने “कोमल हाथ क़लम के साथ” नामक बच्चों का संगठन बनाकर एक नये अभियान की शुरुआत की इस निश्चय के साथ कि उनके घरवाले अब उनकी शिक्षा बाधा नहीं बन सकेंगे।

अन्जू द्वारा सहेलियों के घरवालों को समझाने पर उनमें कोई बदलाव आना तो दूर उल्टे उसे ही भला बुरा कहना शुरु कर दिया कि वह बच्चों को विगाड रही है, आगे से यहाँ नहीं आना आदि आदि। इससे वह कुछ निराश तो ज़रूर हुई उसके घरवालोंने भी उसे ही समझाया कि अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो दूसरों की मत सोचो। परन्तु अन्जू शांत नहीं रही उसने बाल अधिकार एवं उत्थान पर कई लेख पढ़े।

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इन सबसे ज्ञान बढ़ाकर उसने “भय विन होत न प्रीत” वाले सिद्धान्त को अपनाना उचित समझा। मात्र समझा ही एक रास्ता नहीं क़ानूनी सहायता लेना भी ज़रूरी है। परन्तु अकेले यह सम्भव न था अत: उसने गाँव के सरपँच से बाल अधिकारों पर चर्चा कर अपने पक्ष में किया और बताया कि कैसे घरवाले अपनी बच्चियों को स्कूल छुड़ा देते हैं। अब सरपँच जी के साथ घर घर जाकर अन्जू ने उन्हें समझाना शुरु किया। अन्जू कहती है “हम उनके घरों में गये औरउन्हें इसके विरुद्ध जाने पर जेल भिजवाने की धमकी तक दी तब जाकर मेरी सहेलियों न केवल स्कूल जाने लगीं बल्कि समय से स्कूल का काम भी पूरा करने लगीं। इसके सुपरिणाम मिलने लगे ३३%  तक ही नम्बर लाने वाली कविता के ५८% नम्बर आये। घर के वातावरण में भी सुधार आने लगा।

गॉंव वाले अभी तक बच्चों के निर्णयों को गम्भीरता से नहीं लेते थे, परन्तु सरपंच जी के साथ होने से लोगों की सोच में बदलाव आया अब वे उनके निर्णयों को गम्भीरता से लेने लगे। परिवर्तन दिखने लगा अनेक परिवार अपने बच्चों को नियम से स्कूल भेजने लगे।

उत्साहित अन्जू ने गॉंव के सरपंच जी को साथ लेकर १० सदस्यों की एक “Child Protection Committee” नाम की एक समिति का गठन किया जो घर घर जाकर बच्चियों से कम काम लेने को प्रेरित करती है।

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मंज़िल और भी थीं अन्जू ने बाल श्रमिक जैसी कुरीतियाें को गॉंव से ख़त्म करने की ओर ध्यान दिया, राह मुश्किल थी क्योंकि फ़सल के समय मज़दूर न मिलने के कारण बड़े किसान तमाम परिवार के बच्चों को कम मज़दूरी देकर ज़्यादा काम लेने को प्रोत्साहित कर उनका शोषण करते हैं। परिणामत: बच्चों स्कूल व शिक्षा से दूर होते जाते हैं। परिवार वाले आर्थिक सम्पन्न न होने के कारण बच्चों को अपनी पूँजी एवं आय का साधन मानने लगते हैं। अक्सर पाँचवीं पास करते करते वे उन्हें स्कूल से हटा लेते हैं उनका मानना होता कि अब वे मज़दूरी करने लायक हो गये हैं। “Smile Foundation” के आँकड़ों के अनुसार भारत में ९०% ग्रामीण बाल श्रमिकों में से ८०% कृषि कार्यों में लगे हैं।

अन्जू एक संस्मरण बताती है उसके गॉंव में एक परिवार देर तक अपने बच्चों को कृषि कार्य में लगाये रखता। मैं निडर होकर उस परिवार वालों से मिली और बाल श्रम सम्बन्धी क़ानून के बारे में बताया। उन्हें शिक्षा के सकारात्मक पहलू भी बताये साथ ही न मानने पर क़ानून की धमकी भी दी। वो परिवार जो १५ दिन के लिए कार्य करने गाँव में आया था वो  तीन दिन में ही इस वादे के साथ वापस लौट गया कि अब वह बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देगा। परन्तु अन्जू अभी भी आशंकित थी इसलिए उसने अपनी सहेली को उस परिवार पर नज़र रखने को कहा। प्रसन्नता है उन्होंने बच्चों को स्कूल में दाख़िला दिलाकर स्कूल भेजना शुरु कर दिया है। अन्जू अभी उनके सम्पर्क में रहती है, उसका कहना है “मेरा लक्ष्य बाल श्रम अपने गॉंव से ही नहीं हर जगह से ख़त्म करना है। यह सार्वभौमिक समस्या जो मुझे सीमाबद्ध नहीं कर सकती।

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हम अन्जू के अथक प्रयासों के आभारी अनेक बड़े किसानों ने अपने खेतों के आगे सड़क पर नोटिस बोर्ड लगा दिए हैं”हम बाल श्रमिक अपने फ़ार्म पर नहीं रखते”

गॉंव में बाल श्रम की माँग न होने से अब उनके बच्चे स्कूल जाते हैं। गॉंव वालों की। सोच भी बदली है। अब वे लड़के लडकियों में अन्तर नहीं रखते। लड़कियों को घर से बाहर जाने पर भी पाबन्दी नहीं है। अन्जू गर्व से कहती है कभी गॉंव में मैं अकेली साइकिल वाली लड़की थी पर आज गिनना मुश्किल है।

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यात्रा आसान नहीं है। अन्जू के अथक प्रयास दृढ़ निश्चय का परिणाम है आज उसके सभी आलोचक   उसकी तारीफ़ों के पुल बॉंधते हैं। अन्जू कहती है “आज मेरे परिवार में भी परिवर्तन है मेरी मॉं के लिए मैं और मेरा भाई एक समान हैं वह जितना प्यार मेरे भाई से करती है उतना ही मुझसे करती है।”

अन्जू की यात्रा की यह नई शुरुआत है। अन्तहीन यात्रा में अभी भी अनेक पारम्परिक बाधाएँ है परन्तु जहाँ चाह है वहाँ राह है। आज भी अन्जू गॉंव गॉंव यह अलख जगाती है। अन्जू कहती है परिवर्तन एक दिन में सम्भव नहीं।

अन्जू का मानना है गॉंव गॉंव जाने अनेकों आर्थिक, सामाजिक व शारीरिक समस्यायें आतीं हैं। प्रसन्नता का विषय है “Ashoka” जैसी अन्तरराष्ट्रीय संस्था ने अपने “Youth Venture Program” के अन्तर्गत अन्जू का चयन किया है जिससे वह बहुत प्रोत्साहित है।

“The Stories of Change” इन पंक्तियों के साथ अन्जू को शुभकामनायें देती है कि

                    जीवन  का उद्देश्य  नहीं है  शान्त  भुवन में टिक रहना।

                    किन्तु पहुँचना उस मंज़िल तक जिसके आगे राह नहीं।।

अनुवाद – बालेंद्र शेखर

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